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Tuesday, December 22, 2020

दुर्गो की प्रकार



1. पारिख दुर्ग:-  वह दुर्ग जिसके चारों और गहरी खाई हो पारिख दुर्ग की श्रेणी में आता है

 उदाहरण:-  भरतपुर का किला, डीग, लोहागढ़ व बीकानेर का जूनागढ़ का दुर्ग है 

जल(उदक) दुर्ग:- वह दुर्ग अथवा किला जो चारों ओर से पानी से घिरा हुआ हो जल दुर्ग कहलाता है

 उदाहरण:- गागरोण ,मनोहरथाना (झालावाड़), व भैंसरोड़गढ़ (चित्तौड़गढ़), शेरगढ़

 गिरीदुर्ग:- वह दुर्ग एवं किला जो चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हो , जल दुर्ग कहलाता है |
 राजस्थान में सर्वाधिक दुर्ग इस श्रेणी में आते हैं 

धान्वन/भूमि दुर्ग:-  वह दुर्गा अथवा किला जिसके चारों ओर मरुस्थलों | 

 उदाहरण:- जैसलमेर का दुर्ग , भटनेर का किला (यह किला जलदुर्ग भी है), अकबर का किला, नागौर का किला, बीकानेर का किला, चोमू का किला (चौमुहांगढ़) आदि

वन दुर्ग:- वह दुर्ग विचारों और सेवाओं से अथवा कांटेदार वृक्ष से ढका हुआ हो |

उदाहरण :- जालोर का दुर्ग , शेरगढ़ (जलदुर्ग भी है )

सहाय दुर्ग:- सहाय दुर्ग में शूरवीर एवं सदा अनुकूल रहने वाले बांधव लोग रहते थे | चित्तौड़ , जालौर तथा सिवाना दुर्ग सहाय दूर की श्रेणी में आते हैं

सैन्य दुर्ग:- जिसकी व्यूह  रचना में चतुर वीरों के होने से अभेध हो यह दुर्ग सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है 

एरण दुर्ग :-  जिस दुर्ग का मार्ग कांटों और पत्थरों से परिपूर्ण हो 

उदाहरण:- रणथंभोर दुर्ग

 पारिध दुर्ग:- वह दुर्ग जिसके चारों ओर ईट, पत्थर और मिट्टी के बने बड़ी-बड़ी दीवारों का परकोटा हो

उदाहरण:- चित्तौड़गढ़ दुर्ग, कुंभलगढ़ दुर्ग 

काग मुखी:-  दुर्ग जो आगे की ओर गढ़ में प्रवेश मार्ग बिल्कुल साकड़ा और पीछे की ओर फैला हुआ है

 उदाहरण:- जोधपुर का मेहरानगढ़ दुर्ग 

पाशीब :- किले की प्राचीर से हमला करने के लिए रेत और अन्य वस्तुओं से निर्मित एक ऊंचा चबूतरा 

थड़ा :- मृत पुरुष के दाह - स्थान पर बनाया हुआ स्मृति भवन जोधपुर में महाराणा जसवंत सिंह की यादगार में दुर्ग के पास एक संगमरमर का स्मृति भवन बनाया हुआ है जिसे जसवंत थड़ा कहा जाता है 
इसे राजस्थान का ताजमहल का आ जाता है 

हनुमानगढ़ का भटनेर दुर्ग भरतपुर का लोहागढ़ दुर्ग मिट्टी से बने हुए हैं 

जीव रखा :- मुख्य मार्ग से होने वाले आक्रमण को विफल  करने वाली रक्षा भित्ति थी | जीव रखा किले के ढलान वाले  मार्ग पर सैनिक रखने का स्थान था यह छोटा गढ़ वह किला की आत्मा  था 
किले के ऊपर 4 -5 घोड़ों के एक साथ चलने योग्य चौड़ी प्राचीर पर थोड़ी- थोड़ी दूरी पर घुमटिया बनाई जाती थी इसमें  सैनिक नियुक्त रहते थे, जो कवसीस कहलती

Sunday, November 1, 2020

झाला वंश के गोत्र-प्रवरादि



वंश – सूर्य वंश
गोत्र – मार्कण्डेय
शाखा – मध्यनी
कुल – मकवान(मकवाणा)
पर्व तीन – अश्व, धमल, नील
कुलदेवी – दुर्गा,मरमरा देवी,शक्तिमाता
इष्टदेव – छत्रभुज महादेव
भेरव – केवडीया
कुलगोर – मशीलीया राव
शाखाए – झाला,राणा

सोलंकी वंश का गोत्र-प्रवरादि



वंश – अग्निवंश
गोत्र – वशिष्ठ, भारदाज
प्रवर तीन – भारदाज, बार्हस्पत्य, अंगिरस
वेद – यजुर्वेद
शाखा – मध्यन्दिनी
सूत्र – पारस्कर, ग्रहासूत्र
इष्टदेव – विष्णु
कुलदेवी – चण्डी, काली, खीवज
नदी – सरस्वती
धर्म – वैष्णव
गादी – पाटन
उत्पति – आबू पर्वत
मूल पुरुष – चालुक्य देव
निशान – पीला
राव – लूतापड़ा
घोड़ा – जर्द
ढोली – बहल
शिखापद – दाहिना
दशहरा पूजन – खांडा

भाटी वंश के गोत्र-प्रवरादि



वंश – चन्द्रवंश
कुल – यदुवंशी
कुलदेवता – लक्ष्मी नाथ जी
कुलदेवी – स्वागिया माता
इष्टदेव – श्री कृष्ण
वेद – यजुर्वेद
गोत्र – अत्रि
छत्र – मेघाडम्भर
ध्वज – भगवा पीला रंग
ढोल – भंवर
नक्कारा – अगजीत
गुरु – रतन नाथ
पुरोहित – पुष्करणा ब्राह्मण
पोलपात – रतनु चारण
नदी – यमुना
वॄक्ष – पीपल
राग – मांड
विरुद – उतर भड किवाड़ भाटी
प्रणाम – जय श्री कृष्ण

कछवाह वंश के गोत्र-प्रवरादि



गोत्र – मानव, गोतम
प्रवर – मानव, वशिष्ठ
कुलदेव – श्री राम
कुलदेवी – श्री जमुवाय माता जी
इष्टदेवी – श्री जीणमाता जी
इष्टदेव – श्री गोपीनाथ जी
वेद – सामवेद
शाखा – कोथुमी
नदी – सरयू
वॄक्ष – अखेबड़
नगारा – रणजीत
निशान – पंचरंगा
छत्र – श्वेत
पक्षी – कबूतर
तिलक – केशर
झाड़ी – खेजड़ी
गुरु – वशिष्ठ
भोजन – सुर्त
गिलास – सुख
पुरोहित – गंगावत, भागीरथ

चौहान वंश के गोत्र-प्रवरादि



वंश – अग्निवंश
वेद – सामवेद
गोत्र – वत्स
वॄक्ष – आशापाल
नदी – सरस्वती
पोलपात – द्सोदी
इष्टदेव – अचलेश्वर महादेव
कुल देवी – आशापुरा
नगारा – रणजीत
निशान – पीला
झंडा – सूरज, चांद, कटारी
शाखा – कौथुनी
पुरोहित – सनादय(चन्दोरिया)
भाट – राजोरा
धुणी – सांभर
भेरू – काला भेरव
गढ़ – रणथम्भोर
गुरु – वशिष्ठ
तीर्थ – भॄगु क्षेत्र
पक्षी – कपोत
ऋषि – शांडिल्य
नोबत – कालिका
पितृ – लोटजी
प्रणाम – जय आशापुरी
विरद – समरी नरेश

गुहिलोत(सिसोदिया) वंश के गोत्र प्रवरादि

 


वंश – सूर्यवंशी,गुहिलवंश,सिसोदिया,
शक्तावत
गोत्र – वैजवापायन
प्रवर – कच्छ, भुज, मेंष
वेद – यजुर्वेद
शाखा – वाजसनेयी
गुरु – द्लोचन(वशिष्ठ)
ऋषि – हरित
कुलदेवी – बाण माता
कुल देवता – श्री सूर्य नारायण
इष्ट देव – श्री एकलिंगजी
वॄक्ष – खेजड़ी
नदी – सरयू
झंडा – सूर्य युक्त
पुरोहित – पालीवाल
भाट – बागड़ेचा
चारण – सोदा बारहठ
ढोल – मेगजीत
तलवार – अश्वपाल
बंदूक – सिंघल
कटार – दल भंजन
नगारा – बेरीसाल
पक्षी – नील कंठ
निशान – पंच रंगा
निर्वाण – रणजीत
घोड़ा – श्याम कर्ण
तालाब – भोडाला
विरद – चुण्डावत, सारंगदेवोत
घाट – सोरम
ठिकाना – भिंडर
चिन्ह – सूर्य
शाखाए – 24

परमार वंश के गोत्र-प्रवरादि

  परमार वंश के गोत्र-प्रवरादि



वंश – अग्निवंश
कुल – सोढा परमार
गोत्र – वशिष्ठ
प्रवर – वशिष्ठ, अत्रि ,साकृति
वेद – यजुर्वेद
उपवेद – धनुर्वेद
शाखा – वाजसनयि
प्रथम राजधानी – उज्जेन (मालवा)
कुलदेवी – सच्चियाय माता
इष्टदेव – सूर्यदेव महादेव
तलवार – रणतरे
ढाल – हरियण
निशान – केसरी सिंह
ध्वजा – पीला रंग
गढ – आबू
शस्त्र – भाला
गाय – कवली
वृक्ष – कदम्ब,पीपल
नदी – सफरा (क्षिप्रा)
पाघ – पंचरंगी
राजयोगी – भर्तहरी
संत – जाम्भोजी
पक्षी – मयूर
प्रमुख गादी – धार नगरी

तंवर (तोमर) वंश के गोत्र-प्रवरादि

  तंवर (तोमर) वंश के गोत्र-प्रवरादि



वंश – चंद्रवंशी
कुल देवी – चिल्लाय माता
शाखा – मधुनेक,वाजस्नेयी
गोत्र – अत्रि, व्यागर, गागर्य
प्रवर – गागर्य,कौस्तुभ,माडषय
शिखा – दाहिनी
भेरू – गौरा
शस्त्र – खड़ग
ध्वज – पंचरगा
पुरोहित – भिवाल
बारहठ – आपत केदार वंशी
ढोली – रोहतान जात का
स्थान – पाटा मानस सरोवर
कुल वॄक्ष – गुल्लर
प्रणाम – जय गोपाल
निशान – कपि(चील),चन्द्रमा
ढोल – भंवर
नगारा – रणजीत/जय, विजय, अजय
घोड़ा – श्वते
निकास – हस्तिनापुर
प्रमुख गदी – इन्द्रप्रस्थ,दिल्ली
रंग – हरा
नाई – क़ाला
चमार – भारीवाल
शंख – पिचारक
नदी – सरस्वति,तुंगभद्रा
वेद – यजुर्वेद
सवारी – रथ
देवता – शिव
गुरु – सूर्य
उपाधि – जावला नरेश.दिल्लीपति

राजपूतों की वंशावली /Rajput Vanshavali



 "दस रवि से दस चन्द्र से बारह ऋषिज प्रमाण,

चार हुतासन सों भये कुल छत्तिस वंश प्रमाण

भौमवंश से धाकरे टांक नाग उनमान

चौहानी चौबीस बंटि कुल बासठ वंश प्रमाण."

अर्थ:-दस सूर्य वंशीय क्षत्रिय दस चन्द्र वंशीय,बारह ऋषि वंशी एवं चार अग्नि वंशीय कुल छत्तिस क्षत्रिय वंशों का प्रमाण है,बाद में भौमवंश नागवंश क्षत्रियों को सामने करने के बाद जब चौहान वंश चौबीस अलग अलग वंशों में जाने लगा तब क्षत्रियों के बासठ अंशों का पमाण मिलता है।
सूर्य वंश की दस शाखायें:-
१. कछवाह२. राठौड ३. बडगूजर४. सिकरवार५. सिसोदिया ६.गहलोत ७.गौर ८.गहलबार ९.रेकबार १०.जुनने
चन्द्र वंश की दस शाखायें:-
१.जादौन२.भाटी३.तोमर४.चन्देल५.छोंकर६.होंड७.पुण्डीर८.कटैरिया९.स्वांगवंश १०.वैस
अग्निवंश की चार शाखायें:-
१.चौहान२.सोलंकी३.परिहार ४.पमार.
ऋषिवंश की बारह शाखायें:-
१.सेंगर२.दीक्षित३.दायमा४.गौतम५.अनवार (राजा जनक के वंशज)६.विसेन७.करछुल८.हय९.अबकू तबकू १०.कठोक्स ११.द्लेला १२.बुन्देला
चौहान वंश की चौबीस शाखायें:-
१.हाडा २.खींची ३.सोनीगारा ४.पाविया ५.पुरबिया ६.संचौरा ७.मेलवाल८.भदौरिया ९.निर्वाण १०.मलानी ११.धुरा १२.मडरेवा १३.सनीखेची १४.वारेछा १५.पसेरिया १६.बालेछा १७.रूसिया १८.चांदा१९.निकूम २०.भावर २१.छछेरिया २२.उजवानिया २३.देवडा २४.बनकर.
क्षत्रिय जातियो की सूची
क्रमांक नाम गोत्र वंश स्थान और जिला
१. सूर्यवंशी भारद्वाज सूर्य बुलन्दशहर आगरा मेरठ अलीगढ
२. गहलोत बैजवापेण सूर्य मथुरा कानपुर और पूर्वी जिले
३. सिसोदिया बैजवापेड सूर्य महाराणा उदयपुर स्टेट
४. कछवाहा मानव सूर्य महाराजा जयपुर और ग्वालियर राज्य
५. राठोड कश्यप सूर्य जोधपुर बीकानेर और पूर्व और मालवा
६. सोमवंशी अत्रय चन्द प्रतापगढ और जिला हरदोई
७. यदुवंशी अत्रय चन्द राजकरौली राजपूताने में
८. भाटी अत्रय जादौन महारजा जैसलमेर राजपूताना
९. जाडेचा अत्रय यदुवंशी महाराजा कच्छ भुज
१०. जादवा अत्रय जादौन शाखा अवा. कोटला ऊमरगढ आगरा
११. तोमर व्याघ्र चन्द पाटन के राव तंवरघार जिला ग्वालियर
१२. कटियार व्याघ्र तोंवर धरमपुर का राज और हरदोई
१३. पालीवार व्याघ्र तोंवर गोरखपुर
१४. परिहार कौशल्य अग्नि इतिहास में जानना चाहिये
१५. तखी कौशल्य परिहार पंजाब कांगडा जालंधर जम्मू में
१६. पंवार वशिष्ठ अग्नि मालवा मेवाड धौलपुर पूर्व मे बलिया
१७. सोलंकी भारद्वाज अग्नि राजपूताना मालवा सोरों जिला एटा
१८. चौहान वत्स अग्नि राजपूताना पूर्व और सर्वत्र
१९. हाडा वत्स चौहान कोटा बूंदी और हाडौती देश
२०. खींची वत्स चौहान खींचीवाडा मालवा ग्वालियर
२१. भदौरिया वत्स चौहान नौगंवां पारना आगरा इटावा गालियर
२२. देवडा वत्स चौहान राजपूताना सिरोही राज
२३. शम्भरी वत्स चौहान नीमराणा रानी का रायपुर पंजाब
२४. बच्छगोत्री वत्स चौहान प्रतापगढ सुल्तानपुर
२५. राजकुमार वत्स चौहान दियरा कुडवार फ़तेहपुर जिला
२६. पवैया वत्स चौहान ग्वालियर
२७. गौर,गौड भारद्वाज सूर्य शिवगढ रायबरेली कानपुर लखनऊ
२८. वैस भारद्वाज चन्द्र उन्नाव रायबरेली मैनपुरी पूर्व में
२९. गेहरवार कश्यप सूर्य माडा हरदोई उन्नाव बांदा पूर्व
३०. सेंगर गौतम ब्रह्मक्षत्रिय जगम्बनपुर भरेह इटावा जालौन
३१. कनपुरिया भारद्वाज ब्रह्मक्षत्रिय पूर्व में राजाअवध के जिलों में हैं
३२. बिसैन वत्स ब्रह्मक्षत्रिय गोरखपुर गोंडा प्रतापगढ में हैं
३३. निकुम्भ वशिष्ठ सूर्य गोरखपुर आजमगढ हरदोई जौनपुर
३४. सिरसेत भारद्वाज सूर्य गाजीपुर बस्ती गोरखपुर
३५. कटहरिया वशिष्ठ्याभारद्वाज, सूर्य बरेली बंदायूं मुरादाबाद शहाजहांपुर
३६. वाच्छिल अत्रयवच्छिल चन्द्र मथुरा बुलन्दशहर शाहजहांपुर
३७. बढगूजर वशिष्ठ सूर्य अनूपशहर एटा अलीगढ मैनपुरी मुरादाबाद हिसार गुडगांव जयपुर
३८. झाला मरीच कश्यप चन्द्र धागधरा मेवाड झालावाड कोटा
३९. गौतम गौतम ब्रह्मक्षत्रिय राजा अर्गल फ़तेहपुर
४०. रैकवार भारद्वाज सूर्य बहरायच सीतापुर बाराबंकी
४१. करचुल हैहय कृष्णात्रेय चन्द्र बलिया फ़ैजाबाद अवध
४२. चन्देल चान्द्रायन चन्द्रवंशी गिद्धौर कानपुर फ़र्रुखाबाद बुन्देलखंड पंजाब गुजरात
४३. जनवार कौशल्य सोलंकी शाखा बलरामपुर अवध के जिलों में
४४. बहरेलिया भारद्वाज वैस की गोद सिसोदिया रायबरेली बाराबंकी
४५. दीत्तत कश्यप सूर्यवंश की शाखा उन्नाव बस्ती प्रतापगढ जौनपुर रायबरेली बांदा
४६. सिलार शौनिक चन्द्र सूरत राजपूतानी
४७. सिकरवार भारद्वाज बढगूजर ग्वालियर आगरा और उत्तरप्रदेश में
४८. सुरवार गर्ग सूर्य कठियावाड में
४९. सुर्वैया वशिष्ठ यदुवंश काठियावाड
५०. मोरी ब्रह्मगौतम सूर्य मथुरा आगरा धौलपुर
५१. टांक (तत्तक) शौनिक नागवंश मैनपुरी और पंजाब
५२. गुप्त गार्ग्य चन्द्र अब इस वंश का पता नही है
५३. कौशिक कौशिक चन्द्र बलिया आजमगढ गोरखपुर
५४. भृगुवंशी भार्गव चन्द्र वनारस बलिया आजमगढ गोरखपुर
५५. गर्गवंशी गर्ग ब्रह्मक्षत्रिय नृसिंहपुर सुल्तानपुर
५६. पडियारिया, देवल,सांकृतसाम ब्रह्मक्षत्रिय राजपूताना
५७. ननवग कौशल्य चन्द्र जौनपुर जिला
५८. वनाफ़र पाराशर,कश्यप चन्द्र बुन्देलखन्ड बांदा वनारस
५९. जैसवार कश्यप यदुवंशी मिर्जापुर एटा मैनपुरी
६०. चौलवंश भारद्वाज सूर्य दक्षिण मद्रास तमिलनाडु कर्नाटक में
६१. निमवंशी कश्यप सूर्य संयुक्त प्रांत
६२. वैनवंशी वैन्य सोमवंशी मिर्जापुर
६३. दाहिमा गार्गेय ब्रह्मक्षत्रिय काठियावाड राजपूताना
६४. पुण्डीर कपिल ब्रह्मक्षत्रिय पंजाब गुजरात रींवा यू.पी.
६५. तुलवा आत्रेय चन्द्र राजाविजयनगर
६६. कटोच कश्यप भूमिवंश राजानादौन कोटकांगडा
६७. चावडा,पंवार,चोहान,वर्तमान कुमावत वशिष्ठ पंवार की शाखा मलवा रतलाम उज्जैन गुजरात मेवाड
६८. अहवन वशिष्ठ चावडा,कुमावत खेरी हरदोई सीतापुर बारांबंकी
६९. डौडिया वशिष्ठ पंवार शाखा बुलंदशहर मुरादाबाद बांदा मेवाड गल्वा पंजाब
७०. गोहिल बैजबापेण गहलोत शाखा काठियावाड
७१. बुन्देला कश्यप गहरवारशाखा बुन्देलखंड के रजवाडे
७२. काठी कश्यप गहरवारशाखा काठियावाड झांसी बांदा
७३. जोहिया पाराशर चन्द्र पंजाब देश मे
७४. गढावंशी कांवायन चन्द्र गढावाडी के लिंगपट्टम में
७५. मौखरी अत्रय चन्द्र प्राचीन राजवंश था
७६. लिच्छिवी कश्यप सूर्य प्राचीन राजवंश था
७७. बाकाटक विष्णुवर्धन सूर्य अब पता नहीं चलता है
७८. पाल कश्यप सूर्य यह वंश सम्पूर्ण भारत में बिखर गया है
७९. सैन अत्रय ब्रह्मक्षत्रिय यह वंश भी भारत में बिखर गया है
८०. कदम्ब मान्डग्य ब्रह्मक्षत्रिय दक्षिण महाराष्ट्र मे हैं
८१. पोलच भारद्वाज ब्रह्मक्षत्रिय दक्षिण में मराठा के पास में है
८२. बाणवंश कश्यप असुरवंश श्री लंका और दक्षिण भारत में,कैन्या जावा में
८३. काकुतीय भारद्वाज चन्द्र,प्राचीन सूर्य था अब पता नही मिलता है
८४. सुणग वंश भारद्वाज चन्द्र,पाचीन सूर्य था, अब पता नही मिलता है
८५. दहिया कश्यप राठौड शाखा मारवाड में जोधपुर
८६. जेठवा कश्यप हनुमानवंशी राजधूमली काठियावाड
८७. मोहिल वत्स चौहान शाखा महाराष्ट्र मे है
८८. बल्ला भारद्वाज सूर्य काठियावाड मे मिलते हैं
८९. डाबी वशिष्ठ यदुवंश राजस्थान
९०. खरवड वशिष्ठ यदुवंश मेवाड उदयपुर
९१. सुकेत भारद्वाज गौड की शाखा पंजाब में पहाडी राजा
९२. पांड्य अत्रय चन्द अब इस वंश का पता नहीं
९३. पठानिया पाराशर वनाफ़रशाखा पठानकोट राजा पंजाब
९४. बमटेला शांडल्य विसेन शाखा हरदोई फ़र्रुखाबाद
९५. बारहगैया वत्स चौहान गाजीपुर
९६. भैंसोलिया वत्स चौहान भैंसोल गाग सुल्तानपुर
९७. चन्दोसिया भारद्वाज वैस सुल्तानपुर
९८. चौपटखम्ब कश्यप ब्रह्मक्षत्रिय जौनपुर
९९. धाकरे भारद्वाज(भृगु) ब्रह्मक्षत्रिय आगरा मथुरा मैनपुरी इटावा हरदोई बुलन्दशहर
१००. धन्वस्त यमदाग्नि ब्रह्मक्षत्रिय जौनपुर आजमगढ वनारस
१०१. धेकाहा कश्यप पंवार की शाखा भोजपुर शाहाबाद
१०२. दोबर(दोनवर) वत्स या कश्यप ब्रह्मक्षत्रिय गाजीपुर बलिया आजमगढ गोरखपुर
१०३. हरद्वार भार्गव चन्द्र शाखा आजमगढ
१०४. जायस कश्यप राठौड की शाखा रायबरेली मथुरा
१०५. जरोलिया व्याघ्रपद चन्द्र बुलन्दशहर
१०६. जसावत मानव्य कछवाह शाखा मथुरा आगरा
१०७. जोतियाना(भुटियाना) मानव्य कश्यप,कछवाह शाखा मुजफ़्फ़रनगर मेरठ
१०८. घोडेवाहा मानव्य कछवाह शाखा लुधियाना होशियारपुर जालन्धर
१०९. कछनिया शान्डिल्य ब्रह्मक्षत्रिय अवध के जिलों में
११०. काकन भृगु ब्रह्मक्षत्रिय गाजीपुर आजमगढ
१११. कासिब कश्यप कछवाह शाखा शाहजहांपुर
११२. किनवार कश्यप सेंगर की शाखा पूर्व बंगाल और बिहार में
११३. बरहिया गौतम सेंगर की शाखा पूर्व बंगाल और बिहार
११४. लौतमिया भारद्वाज बढगूजर शाखा बलिया गाजी पुर शाहाबाद
११५. मौनस मानव्य कछवाह शाखा मिर्जापुर प्रयाग जौनपुर
११६. नगबक मानव्य कछवाह शाखा जौनपुर आजमगढ मिर्जापुर
११७. पलवार व्याघ्र सोमवंशी शाखा आजमगढ फ़ैजाबाद गोरखपुर
११८. रायजादे पाराशर चन्द्र की शाखा पूर्व अवध में
११९. सिंहेल कश्यप सूर्य आजमगढ परगना मोहम्दाबाद
१२०. तरकड कश्यप दीक्षित शाखा आगरा मथुरा
१२१. तिसहिया कौशल्य परिहार इलाहाबाद परगना हंडिया
१२२. तिरोता कश्यप तंवर की शाखा आरा शाहाबाद भोजपुर
१२३. उदमतिया वत्स ब्रह्मक्षत्रिय आजमगढ गोरखपुर
१२४. भाले वशिष्ठ पंवार अलीगढ
१२५. भालेसुल्तान भारद्वाज वैस की शाखा रायबरेली लखनऊ उन्नाव
१२६. जैवार व्याघ्र तंवर की शाखा दतिया झांसी बुन्देलखंड
१२७. सरगैयां व्याघ्र सोमवंश हमीरपुर बुन्देलखण्ड
१२८. किसनातिल अत्रय तोमरशाखा दतिया बुन्देलखंड
१२९. टडैया भारद्वाज सोलंकीशाखा झांसी ललितपुर बुन्देलखंड
१३०. खागर अत्रय यदुवंश शाखा जालौन हमीरपुर झांसी
१३१. पिपरिया भारद्वाज गौडों की शाखा बुन्देलखंड
१३२. सिरसवार अत्रय चन्द्र शाखा बुन्देलखंड
१३३. खींचर वत्स चौहान शाखा फ़तेहपुर में असौंथड राज्य
१३४. खाती कश्यप दीक्षित शाखा बुन्देलखंड,राजस्थान में कम संख्या होने के कारण इन्हे बढई गिना जाने लगा
१३५. आहडिया बैजवापेण गहलोत आजमगढ
१३६. उदावत बैजवापेण गहलोत आजमगढ
१३७. उजैने वशिष्ठ पंवार आरा डुमरिया
१३८. अमेठिया भारद्वाज गौड अमेठी लखनऊ सीतापुर
१३९. दुर्गवंशी कश्यप दीक्षित राजा जौनपुर राजाबाजार
१४०. बिलखरिया कश्यप दीक्षित प्रतापगढ उमरी राजा
१४१. डोमरा कश्यप सूर्य कश्मीर राज्य और बलिया
१४२. निर्वाण वत्स चौहान राजपूताना (राजस्थान)
१४३. जाटू व्याघ्र तोमर राजस्थान,हिसार पंजाब
१४४. नरौनी मानव्य कछवाहा बलिया आरा
१४५. भनवग भारद्वाज कनपुरिया जौनपुर
१४६. गिदवरिया वशिष्ठ पंवार बिहार मुंगेर भागलपुर
१४७. रक्षेल कश्यप सूर्य रीवा राज्य में बघेलखंड
१४८. कटारिया भारद्वाज सोलंकी झांसी मालवा बुन्देलखंड
१४९. रजवार वत्स चौहान पूर्व मे बुन्देलखंड
१५०. द्वार व्याघ्र तोमर जालौन झांसी हमीरपुर
१५१. इन्दौरिया व्याघ्र तोमर आगरा मथुरा बुलन्दशहर
१५२. छोकर अत्रय यदुवंश अलीगढ मथुरा बुलन्दशहर
१५३. जांगडा वत्स चौहान बुलन्दशहर पूर्व में झांसी

Friday, October 30, 2020

राव सीहा जी

 


राव सीहा जी राजस्थान में स्वतंत्र राठौड़ राज्य के संस्थापक थे | राव सीहा जी के वीर वंशज अपने शौर्य, वीरता एवं पराक्रम व तलवार के धनी रहे है |मारवाड़ में राव सीहा जी द्वारा राठौड़ साम्राज्य का विस्तार करने में उनके वंशजो में राव धुहड़ जी , राजपाल जी , जालन सिंह जी ,राव छाडा जी , राव तीड़ा जी , खीम करण जी ,राव वीरम दे , राव चुडा जी , राव रिदमल जी , राव जोधा , बीका , बीदा, दूदा , कानध्ल , मालदेव का विशेष क्रमबद्ध योगदान रहा है |

 इनके वंशजों में दुर्गादास व अमर सिंह जैसे इतिहास प्रसिद्ध व्यक्ति हुए| राव सिहा सेतराम जी के आठ पुत्रों में सबसे बड़े थे| !

चेतराम सम्राट के, पुत्र अस्ट महावीर !
जिसमे सिहों जेस्ठ सूत , महारथी रणधीर ||
राव सिहाँ जी सं. 1268 के लगभग पुष्कर की तीर्थ यात्रा के समय मारवाड़ आये थे उस मारवाड़ की जनता मीणों, मेरों आदि की लूटपाट से पीड़ित थी , राव सिहा के आगमन की सूचना पर पाली नगर के पालीवाल ब्राहमण अपने मुखिया जसोधर के साथ सिहा जी मिलकर पाली नगर को लूटपाट व अत्याचारों से मुक्त करने की प्रार्थना की| अपनी तीर्थ यात्रा से लौटने के बाद राव सिहा जी ने भाइयों व फलोदी के जगमाल की सहायता से पाली में हो रहे अत्याचारों पर काबू पा लिया एवं वहां शांति व शासन व्यवस्था कायम की, जिससे पाली नगर की व्यापारिक उन्नति होने लगी|

आठों में सिहाँ बड़ा ,देव गरुड़ है साथ |
बनकर छोडिया कन्नोज में ,पाली मारा हाथ ||

पाली के अलावा भीनमाल के शासक के अत्याचारों की जनता की शिकायत पर जनता को अत्याचारों से मुक्त कराया |

भीनमाल लिधी भडे,सिहे साल बजाय|
दत दीन्हो सत सग्रहियो, ओ जस कठे न जाय||

पाली व भीनमाल में राठौड़ राज्य स्थापित करने के बाद सिहा जी ने खेड़ पर आक्रमण कर विजय कर लिया| इसी दौरान शाही सेना ने अचानक पाली पर हमला कर लूटपाट शुरू करदी ,हमले की सूचना मिलते ही सिहा जी पाली से 18 KM दूर बिठू गावं में शाही सेना के खिलाफ आ डटे, और मुस्लिम सेना को खधेड दिया| वि. सं . 1330 कार्तिक कृष्ण दवादशी सोमवार को करीब 80 वर्ष की उमर में सिहा जी स्वर्गवास हुआ व उनकी सोलंकी रानी पार्वती इनके साथ सती हुई | 

सिहाजी की रानी (पाटन के शासक जय सिंह सोलंकी की पुत्री )से बड़े पुत्र आस्थान जी हुए जो पिता के बाद मारवाड़ के शासक बने | 

राव सिहं जी राजस्थान में राठौड़ राज्य की नीवं डालने वाले पहले व्यक्ति थे |

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