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Monday, August 3, 2015

जज़्बातों के व्यापार में

कहीं रौशनी इतनी ज्यादा
उसे अंधेरों की तलाश है
कहीं अंधेरे घर खड़े हैं
उसके इंतजार में।
बाहर से दुनियां एक गेंद की तरह लगती जरूर
अंदर बटी नफरत और प्यार मे।
कहें दीपक बापू
जिन चीजों में दिल लगता है
महंगी मिलती बाज़ार में
अपने घाव सहलाने के लिये क्यों हमदर्द ढूंढे
अमीर हो गये बहुत लोग
जज़्बातों के व्यापार में।


-दीपक बापू

Sunday, August 2, 2015

बिटिया अब बड़ी हो गई है

देख रही थी
उस रोज़ बेटी को
सजते-सँवरते
शीशे में अपनी
आकृति घंटों निहारते
नयनों में आस का
काजल लगाते,

उसके दुपट्टे को
बार-बार सरकते
और फिर अपनी उलझी
लटों को सुलझाते
हम उम्र लड़कियों के
साथ हँसते-खिलखिलाते ।
माँ से अपनी हर बात छिपाते
अकेले में ख़ुद से
सवाल करते,
फिर शरमा के,
सर को झुकाते ।
और फिर कभी स्तब्ध
मौंन हो जाते;
कभी-कभी आँखों
से आँसू बहाते
फिर दोनों हाथों से
मुँह को छिपाते ।
देखकर सोचती हूँ उसे
लगता है,
बिटिया अब बड़ी
हो गई है !!

                    --अंजना बख्शी

बेटियाँ

बेटियाँ रिश्तों-सी पाक होती हैं
जो बुनती हैं एक शाल
अपने संबंधों के धागे से।
बेटियाँ धान-सी होती हैं
पक जाने पर जिन्हें
कट जाना होता है जड़ से अपनी
फिर रोप दिया जाता है जिन्हें
नई ज़मीन में।
बेटियाँ मंदिर की घंटियाँ होती हैं
जो बजा करती हैं
कभी पीहर तो कभी ससुराल में।
बेटियाँ पतंगें होती हैं
जो कट जाया करती हैं अपनी ही डोर से
और हो जाती हैं पराई।
बेटियाँ टेलिस्कोप-सी होती हैं
जो दिखा देती हैं– दूर की चीज़ पास।
बेटियाँ इन्द्रधनुष-सी होती हैं, रंग-बिरंगी
करती हैं बारिश और धूप के आने का इंतज़ार
और बिखेर देती हैं जीवन में इन्द्रधनुषी छटा।
बेटियाँ चकरी-सी होती हैं
जो घूमती हैं अपनी ही परिधि में
चक्र-दर-चक्र चलती हैं अनवरत
बिना ग्रीस और तेल की चिकनाई लिए
मकड़जाले-सा बना लेती हैं
अपने इर्द-गिर्द एक घेरा
जिसमें फँस जाती हैं वे स्वयं ही।
बेटियाँ शीरीं-सी होती हैं
मीठी और चाशनी-सी रसदार
बेटियाँ गूँध दी जाती हैं आटे-सी
बन जाने को गोल-गोल संबंधों की रोटियाँ
देने एक बीज को जन्म।
बेटियाँ दीये की लौ-सी होती हैं सुर्ख लाल
जो बुझ जाने पर, दे जाती हैं चारों ओर
स्याह अंधेरा और एक मौन आवाज़।

- अंजना बख्शी

तड़प

शक्ल जब बस गई आँखों में तो छुपना कैसा
दिल में घर करके मेरी जान ये परदा कैसा
आप मौजूद हैं हाज़िर है ये सामान-ए-निशात
उज़्र सब तै हैं बस अब वादा-ए-फ़रदा कैसा
तेरी आँखों की जो तारीफ़ सुनी है मुझसे
घूरती है मुझे ये नर्गिस-ए-शेहला कैसा
ऐ मसीहा यूँ ही करते हैं मरीज़ों का इलाज
कुछ न पूछा कि है बीमार हमारा कैसा
क्या कहा तुमने, कि हम जाते हैं, दिल अपना संभाल
ये तड़प कर निकल आएगा संभलना कैसा

मंज़र

कौन जाने इस शहर को क्या हुआ है दोस्तो
अजनबी-सा हर कोई चेहरा हुआ है दोस्तो।
मज़हबों ने बेच दी है मन्दिरों की आत्मा
मस्जिदों की रूह का सौदा हुआ है दोस्तो।
कौन मानेगा यहाँ पर भी इबादतगाह थी
ज़र्रा-ज़र्रा इस क़दर सहमा हुआ है दोस्तो।
कुछ दरिन्दे और वहशी लोग रहते हैं यहाँ
आप सबको भ्रम शरीफों का हुआ है दोस्तो।
ज़िन्दगी आने से भी कतराएगी बरसों-बरस
हर गली में मौत का जलसा हुआ है दोस्तो।
हर कोई झूठी तसल्ली दे रहा है इन दिनों
ये शहर रूठा हुआ बच्चा हुआ है दोस्तो।
ज़िन्दगी फिर भी रहेगी ज़िन्दगी, हारेगी मौत
पहले भी मंज़र यही देखा हुआ है दोस्तो।

इच्छा

था तुम्हें मैंने रुलाया
हा, तुम्हारी मृदुल इच्छा!
हाय, मेरी कटु अनिच्छा!
था बहुत माँगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!
स्नेह का वह कण तरल था,
मधु न था, न सुधा-गरल था,
एक क्षण को भी, सरलते, क्यों समझ तुमको न पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!
बूँद कल की आज सागर,
सोचता हूँ बैठ तट पर -
क्यों अभी तक डूब इसमें कर न अपना अंत पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!
                                           - बच्चन

फोजी

ये एक फोजी की करुण गाथा है,
जब वो युद्ध पर जाता है तो अपने साथी से बोलता है :

“साथी घर जाकर मत कहना,
संकेतो में बतला देना..
मेरा हाल मेरी बहना पूछे तो, सर उसका सहला देना
इतने पर भी न समझे तो, राखी तोड़ देखा देना !
“साथी घर जाकर मत कहना,
संकेतो में बतला देना..
मेरा हाल मेरे पत्नी पूछे तो, मस्तक को झुका लेना
इतने पर भी न समझे तो, मांग का सिन्दूर मिटा देना !
“साथी घर जाकर मत कहना,
संकेतो में बतला देना ..
मेरा हाल मेरी माँ पूछे तो, दो आंसू छलका देना
इतने पर भी न समझे तो, जलता दीप बुझा देना !
“साथी घर जाकर मत कहना,
संकेतो में बतला देना..
मेरा हाल मेरे बूढ़े पिता पूछे तो, हाथो को सहला देना
इतने पर भी न समझे तो, लाठी तोड़ दिखा देना ...!

ज़िंदगी

हारना तब आवश्यक हो जाता है
जब लङाई "अपनों से हो"
...और....
जीतना तब आवश्यक हो जाता है
जब लङाई "अपने आप से हो"
मंजिल मिले ना मिले ये तो मुकद्दर की बात है!
हम कोशिश भी ना करे. ये तो गलत बात है...
हद-ए-शहर से निकली तो गाँव गाँव चली।
कुछ यादें मेरे संग पांव पांव चली।
सफ़र जो धूप का किया तो तजुर्बा हुआ।
वो जिंदगी ही क्या जो छाँव छाँव चली।।....
कल एक झलक ज़िंदगी को देखा,
वो राहों पे मेरी गुनगुना रही थी,
फिर ढूँढा उसे इधर उधर
वो आँख मिचौली कर मुस्कुरा रही थी,
एक अरसे के बाद आया मुझे क़रार,
वो सहला के मुझे सुला रही थी
हम दोनों क्यूँ ख़फ़ा हैं एक दूसरे से
मैं उसे और वो मुझे समझा रही थी,
मैंने पूछ लिया- क्यों इतना दर्द दिया कमबख़्त तूने,
वो हँसी और बोली- मैं ज़िंदगी हूँ पगले
तुझे जीना सिखा रही थी।
                                                    –हरिवंशराय बच्चन जी 

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